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ढिबरी चैनल का घोषणापत्र

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विनोद विप्लव((नोट- यह व्यंग्य रचना महान व्यंग्यकार एवं गुरुवर हरिशंकर परसाई की एक प्रसिद्ध व्यंग्य रचना से प्रभावित है और मुझे लगता है कि अगर परसाई जी आज जीवित होते तो इस विषय पर जरूर कलम चलाते। इस व्यंग्य का पहला हिस्सा यहां पेश हैं। वैसे ढिबरी चैनल के बारे में विज्ञापन तो अखबारों में छप चुका था, लेकिन ढिबरी न्यूज के 'एम्स एंड आब्जेक्टिव्स्' तथा उसके गठन के 'मेमोरेंडम' बही खातों के बीच दबे रह गये थे। यह लेखक जब किसी काम से चैनल के मुख्यालय में गया तो सेठजी के आसन के पास की एक पुरानी बही में यह नत्थी किया हुआ मिला जिसे हम यहां घोषणापत्र के नाम से प्रस्तुत कर रहे हैं। वैसे सबसे पहले इसे ही छापा जाना चाहिये था, लेकिन समय पर उपलब्ध नहीं होने के कारण इसे अब सुधी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है। -लेखक))


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....तो इतने बड़े चोर हैं एमिटी यूनिवर्सिटी वाले!

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यूजीसी-एआईसीटीई टीम ने किया निरीक्षण : कई गड़बड़ियों-घपलों का खुलासा : मान्यता का आवेदन ठुकराया : गोवा यूनिवर्सिटी के पूर्व वीसी प्रोफेसर बीएस सोंदे के नेतृत्व वाली 11 सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति ने 16-17 जुलाई 2009 को किए गए एमिटी यूनिवर्सिटी के निरीक्षण से संबंधित अपनी रिपोर्ट को यूजीसी- एआईसीटीई को सौंप दी है। रिपोर्ट में एमिटी के खिलाफ काफी सारी बातें कही गई हैं। एमिटी के ढेर सारे खेल-तमाशों का पर्दाफाश किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक एमिटी यूनिवर्सिटी में दर्जनों प्रोफेशनल और टेक्निकल कोर्स संबंधित काउंसिलों से मंजूरी लिए बिना ही संचालित किए जा रहे हैं, जो बिलकुल गलत है। नंबर एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी होने का ढिंढोरा पीटने वाली एमिटी यूनिवर्सिटी की पूरी राम कहानी आप सुनेंगे तो दांतों तले उंगलियां दबा लेंगे। सिर्फ चार साल में इस विश्वविद्यालय ने सेटिंग-गेटिंग के फार्मूले पर चलते हुए इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा कर लिया। नियम-कानून बनाने वाले और उसका पालन कराने वाले एमिटी के गड़बड़-घोटालों की तरफ से आंख मूंदे हुए हैं। मीडिया वाले भारी-भरकम विज्ञापन लेकर एमिटी के गड़बड़घोटालों को छापने से परहेज करते हैं।

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बच गए याकूब कुरैशी के 51 करोड़ रुपए!

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सलीम अख्तर सिद्दीकीखबर है कि हजरत मौहम्मद साहब के कार्टून की श्रंखला बनाने वाले डेनमार्क के कॉर्टूनिस्ट कर्ट वेस्टरगार्ड की एक सोमालियाई युवक ने जान लेने की कोशिश की है। आपको याद होगा कि डेनमार्क के उस कार्टूनिस्ट का कत्ल करने वाले को हमारे शहर मेरठ के एक नेता हाजी याकूब कुरैशी ने ने 51 करोड़ रुपए देने का ऐलान किया था। कुरैशी के ऐलान की गूंज पूरी दुनिया में हुई थी। याकूब कुरैशी रातों-रात सुर्खियों में आ गए थे। वे आशिक-ए-रसूल (पहली बार पता चला था कि आशिक-ए-रसूल कैसे बना जाता है) हो गए थे। मालूम नहीं कि सोमालिया के युवक तक आशिक-ए-रसूल के ऐलान की खबर पहुंची थी या नहीं, हां इतना जरुर है कि यदि वह युवक कार्टूनिस्ट को कत्ल करने में कामयाब हो जाता तो 51 करोड़ रुपए का हकदार हो जाता। यह सवाल भी मेरे दिमाग में घुमड़ रहा है कि याकूब कुरैशी अपने वादे पर खरे उतरते या नहीं?

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सवाल बड़ा भारी

जिसे देखो वही आजकल मीडिया को दो-चार गाली दे रहा है. ऐसा क्यों?
 
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